महाभारत हमेशा से अर्जुन के बिना अधूरी रही है। कहा जाता है की पांडवो को राज्य दिलाने मे सबसे ज्यादा पराक्रम अर्जुन का रहा है ।

महाभारत कथा  हमेशा से धर्म और अधर्म की लड़ाई का जीता जागता उदाहरण रहा है। इस महाभारत (Mahabharata ) काल में ना जाने कितने वचन दिए गए और ना जाने कितने वचन तोड़े गए। ना जाने कितनी बार धर्म को अधर्म के सामने सर झुकाना पड़ा।

ना जाने कितनी बार छल हुआ। चाहे वो द्रौपदी का चीर हरण हो या लाक्षागृह में पांडवों को जलाने की साजिश सब कुछ हुआ और नतीजा महाभारत

महाभारत किसी की कभी भी सोची समझी साजिश नहीं थी , बल्कि उस समय माहौल ऐसा बनता चला गया जो महाभारत करा बैठा।  जैसे इंद्रप्रस्थ में दुर्योधन का अपमान , जहाँ उसे बोला गया कि अंधे का बेटा भी अँधा होता है। 

वास्तव में ये वाक्य एक दासी ने बोले थे जो कि द्रौपदी के ठीक पीछे खड़ी  थी  जिससे कि दुर्योधन को लगा की पांचाली ने उसका अपमान किया। और फिर दुर्योधन ने उसका बदला चीर हरण करके लिया।

इसी तरह का एक बहुत रोचक वाकया है अर्जुन का युधिष्ठिर का वध करने का ठान  लेना  . हम सब जानते हैं कि पांचो पांडव धर्म पर चलने वाले थे , और अपने से बड़ों के लिए हद से ज्यादा सम्मान रखते थे। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि जिस अर्जुन ने पांचाली के चीरहरण के दोषी युधिष्ठिर को तब कुछ नहीं कहा तो अचानक ऐसा क्या बड़ा हुआ होगा जो अर्जुन ने अपना आपा खो दिया।

आइये आपको विस्तार से बताते हैं —

आपको पता ही है कि  अर्जुन के धनुष का नाम गांडीव था। और उसको ये धनुष खुश होकर अग्नि देव ने दिया था। वो महाप्रलयंकारी धनुष था जो एक लाख धनुषों के बराबर था। गांडीव के बारे में जानने के लिए पढ़ें —

अर्जुन (Arjun) के गाँडीव के अनसुलझे रहस्य

अब चूँकि अर्जुन के लिए ये धनुष बहुत ही मायने रखता था तो धीरे धीरे अर्जुन का इसके प्रति लगाव बढ़ता चला गया , और अर्जुन ने प्रतिज्ञा  ली कि अगर किसी ने भी, वो चाहे अपना हो या पराया , देव हो या दानव , अर्जुन से गांडीव त्यागने की बात कही तो वो उसी समय उसे मृत्युदंड दे देंगे।

कुरुक्षेत्र युद्ध का 17वां दिन —

अर्जुन कर्ण युद्ध

महाभारत में गुरु द्रोण की मृत्यु के बाद कर्ण को कौरव सेना का सेनापति बनाया गया था। सेनापति बनते ही कर्ण  ने पांडव सेना में खलबली मचा दी थी। जिस तरफ कर्ण जाता था पांडवों की सेना का सफाया कर देता था।

ये देख कर युधिष्ठिर को गुस्सा आ गया और उन्होंने कौरवों  की सेना पे जोरदार हमला कर दिया। अपनी सेना को मरता देख कर कर्ण को बहुत गुस्सा आ गया और वो रथ लेके युधिष्ठिर से युद्ध करने पहुंच गया। दुर्योधन ने कर्ण को आदेश दिया की वो युधिष्ठिर को बंदी बना ले। 

यह युद्ध का 17वां दिन था और कर्ण था युधिष्ठिर के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। सभी को इस युद्ध के परिणाम का इंतज़ार था कि तभी धनुर्विद्या में माहिर कर्ण ने युधिस्ठिर पर अपने दिव्यास्त्रों का प्रहार किया। जिससे युधिष्ठिर बुरी तरह घायल हो गए।  सारथि ने जब देखा तो वो उन्हें रथ से युद्ध भूमि से दूर ले गया।

। युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए दुर्योधन तथा अन्य महारथी युधिष्ठिर के पीछे दौड़े पर नकुल और सहदेव ने उन्हें बीच  में ही रोक दिया। युधिष्ठिर अपने शिविर में आ गए। कर्ण से पराजित होकर उन्हें बहुत अपमानित महसूस हो रहा था। 

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जब कर्ण ने भार्गवास्त्र का प्रयोग किया —

उसके बाद कर्ण ने अपने महाशक्तिशाली अस्त्र भार्गवास्त्र का प्रयोग किया।  इस अस्त्र ने युद्धभूमि में ऐसा विनाश तांडव मचाया की स्वयं कृष्णा और अर्जुन भी दंग रह गए। इस अस्त्र से अनंत बाण निकलते जा रहे थे जो पूरी पूरी सेना को भूमि में गिराते जा रहे थे पर बाण थे कि रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

जब  अर्जुन ने ये देखा तो उन्होंने कृष्ण जी से बोला कि माधव मेरे पास इस अस्त्र को काटने के लिए कोई भी अस्त्र नहीं है। तब कृष्ण जी ने कहा कि अर्जुन जब युद्ध में शत्रु आप पर भारी पड़ने लगे और आप के पास तुरंत उसका कोई उत्तर ना हो तो वहां से चले जाना ही उचित होता है।

मुझे लगता है अर्जुन कि  इस समय हमें भ्राता युधिष्ठिर को देखने चलना चाहिए।  भीम को बोल कर वो दोनों युधिष्ठिर के पास चले जाते हैं , वहां  नकुल और सहदेव उनका उपचार कर रहे थे। 

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जब युधिष्ठिर को लगा कर्ण मारा गया —

अर्जुन युधिस्थिर संवाद

जब युधिष्ठिर ने अर्जुन को अपने शिविर की तरफ आते हुए देखा तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें लगा कि उनका भाई उनके अपमान का बदला ले के कर्ण को मार कर आ गया है।  अर्जुन के आते ही उन्होंने अर्जुन को गले से लगा लिया।

परन्तु जैसे ही उन्हें पता लगा कि अर्जुन भीम को अकेले युद्ध में छोड़ कर यहाँ आ गए हैं और उन्होंने कर्ण को नहीं मारा है , उनके क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने अर्जुन को डरपोक कहा और बोला कि  अगर तुम कर्ण से डरते हो तो मुझे पहले ही बता देते , हम 4 भाई मिल कर कुछ उपाय सोच लेते उससे युद्ध का।

उन्होंने अर्जुन से ये तक कह डाला कि काश तुम माँ के गर्भ में पांचवे महीने में ही मर गए होते तो अच्छा होता। इससे अर्जुन को बहुत दुःख हुआ और अपना अपमान भी लगा।  तभी अचानक गुस्से में युधिष्ठिर ने भूल वश ये कह दिया की तुम इस गांडीव के लायक ही नहीं हो, इसे किसी और को दे दो। 

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अर्जुन गुस्से से पागल हो गए और उन्हें अपनी प्रतिज्ञा याद  आ गयी।  अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए तुरंत ही अर्जुन ने तलवार उठा ली और युधिष्ठिर की तरफ उनका वध करने के लिए दौड़ पड़े। कृष्णा ये देख के हतप्रभ रह गए।  उन्हें  समझ ही नहीं आया की अचानक अर्जुन ने अपने ही बड़े भाई को मारने का निर्णय कैसे कर लिया। 

कृष्ण ने अर्जुन को रोक कर इसका कारण पूछा तो अर्जुन ने प्रतिज्ञा वाली बात बता दी।

अर्जुन ने उनसे कहा कि प्रभु कोई उपाय बताएं जिससे मेरी प्रतिज्ञा भी पूरी हो जाये और मेरे भाई भी बच जाएं। तब  कृष्ण ने कहा कि जबतक सम्माननीय व्यक्ति सम्मान पाता है तभी तक वो जीवित माना जाता है , जिस दिन उसका अपमान हो जाये उसे मरा ही माना जाता है। 

श्री  कृष्ण ने कहा कि भ्राता युधिष्ठिर आपके पूज्यनीय हैं , और तुम इन्हे “आप” कहते हो , अगर आज इन्हे

 “तुम ” कह के बुला लो तो भी ये इनका अपमान ही होगा और धर्मराज का वध माना जायेगा। तब अर्जुन ने मजबूरी में युधिष्ठिर से अपशब्द बोले।  

गाँडीव प्रेम

परन्तु इसके बाद अर्जुन बहुत दुखी थे और उदास हो कर उन्होंने अपने गले पर तलवार रख ली। 

श्री कृष्णा ने पूछा कि पार्थ अब क्या हुआ तो अर्जुन ने बोला  कि मैंने अपने बड़े भाई का अपमान किया है मुझे जीने का कोई हक़ नहीं है।

तब कृष्णा ने अर्जुन से बोला कि  पार्थ अगर तुमने युधिष्ठिर को मारा होता तो भी तुम्हे नर्क की प्राप्ति होती और अगर तुमने आत्मघात किया यानि स्वयं को मारा तो भी नर्क ही मिलेगा।

इस समस्या से निकलने के लिए तुम अपना खूब गुणगान करो। अपना गुणगान काने वाला भी यही माना जाता है की वो आत्महत्या कर रहा है। फिर अर्जुन ने अपना खूब गुणगान किया और आत्महत्या करने से बच गए। 

वन जाने के लिए तैयार हो गए थे युधिष्ठिर —

महाभारत मे कृष्ण लीला

अर्जुन के कटु वचन सुन कर युधिष्ठिर को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने बोला कि अर्जुन मैंने अच्छे काम नहीं किये हैं , मेरे कर्मों के कारण ही तुम सबको इतना दुःख प्राप्त हुआ है। मेरी बुद्धि मारी गयी है।  मैं आलसी और डरपोक हूँ। इसलिए मैं आज ही वन में चला जाता हूँ। 

तब भगवान कृष्ण के समझाने पर उन्होंने अर्जुन को क्षमा कर दिया।इस तरह महाभारत में कृष्ण ने अपने धर्म ज्ञान से दोनों के ही प्राण बचा लिए।  

आशा है आपको ये लेख पसंद आया होगा। 

Categories: Stories

10 Comments

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